एल नीनो और भारत का मौसम: पूरी सच्चाई!
एल नीनो (El Nino) दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जलवायु घटनाओं में से एक है। जब भी एल नीनो सक्रिय होता है, भारत में मानसून, तापमान, कृषि, जल संसाधन और अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव देखने को मिलता है। हालांकि आम लोगों में यह धारणा है कि "एल नीनो मतलब सूखा", लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है। वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।
एल नीनो क्या है?
एल नीनो, ENSO (El Niño Southern Oscillation) नामक वैश्विक जलवायु प्रणाली का गर्म चरण है। इसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के समुद्री जल का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इस गर्मी के कारण वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण बदल जाता है और दुनिया के कई क्षेत्रों में मौसम प्रभावित होता है।
सामान्य परिस्थितियों में व्यापारिक हवाएँ (Trade Winds) गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर धकेलती हैं। लेकिन एल नीनो के दौरान ये हवाएँ कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे गर्म पानी पूर्वी प्रशांत की ओर फैल जाता है और मौसम चक्र बदल जाता है।
भारत के मानसून पर एल नीनो का प्रभाव
भारत का दक्षिण-पश्चिम मानसून हिंद महासागर और आसपास के तापमान तथा वायुदाब पर निर्भर करता है। एल नीनो के दौरान मानसून की ताकत कमजोर पड़ सकती है, जिससे वर्षा कम होने की संभावना बढ़ जाती है।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य है:
हर एल नीनो वर्ष में सूखा नहीं पड़ता।
इतिहास में 1982, 1987, 2002 और 2009 जैसे वर्षों में एल नीनो के साथ गंभीर सूखा देखा गया, जबकि 1997 और 2006 में एल नीनो होने के बावजूद भारत में मानसून सामान्य रहा। इसका कारण भारतीय महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole - IOD) जैसे अन्य जलवायु कारक थे, जिन्होंने एल नीनो के प्रभाव को काफी हद तक संतुलित कर दिया।
एल नीनो के दौरान भारत में क्या-क्या होता है?
1. मानसून कमजोर पड़ सकता है
भारत में औसत से कम वर्षा होने की संभावना बढ़ जाती है। इससे कृषि क्षेत्र प्रभावित हो सकता है।
2. गर्मी और हीटवेव बढ़ सकती हैं
एल नीनो वर्षों में तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना रहती है। कई राज्यों में हीटवेव की घटनाएँ बढ़ सकती हैं।
3. कृषि पर असर
धान, दालें, गन्ना और अन्य खरीफ फसलों को पर्याप्त वर्षा की आवश्यकता होती है। कम बारिश होने पर उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
4. खाद्य महंगाई
यदि फसल उत्पादन घटता है तो खाद्यान्नों और सब्जियों के दाम बढ़ सकते हैं।
5. जल संकट
कम वर्षा से जलाशयों, नदियों और भूजल पर दबाव बढ़ सकता है।
क्या 2026 में एल नीनो भारत के लिए चिंता का विषय है?
2026 में मौसम एजेंसियों और वैज्ञानिक संस्थानों ने एल नीनो की वापसी की पुष्टि की है। कई पूर्वानुमानों के अनुसार यह एक मजबूत एल नीनो हो सकता है, जिससे भारत में सामान्य से कम मानसून वर्षा का जोखिम बढ़ गया है। हालांकि मौसम वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल एल नीनो के आधार पर पूरे मानसून का सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि IOD और अन्य कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
क्या भारत पहले की तुलना में अधिक तैयार है?
हाँ। पिछले दो दशकों में भारत ने सिंचाई सुविधाओं का विस्तार किया है, जलाशयों की क्षमता बढ़ाई है और मौसम पूर्वानुमान तकनीकों में सुधार किया है। इसलिए एल नीनो का प्रभाव आज भी महत्वपूर्ण है, लेकिन देश पहले की तुलना में अधिक सक्षम माना जाता है।
निष्कर्ष
एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जो भारत के मानसून और मौसम को प्रभावित कर सकती है। यह सच है कि एल नीनो के दौरान कम बारिश, अधिक गर्मी और कृषि संबंधी चुनौतियों का खतरा बढ़ जाता है। लेकिन यह कहना गलत होगा कि हर एल नीनो वर्ष में सूखा निश्चित है। भारतीय महासागर द्विध्रुव (IOD), स्थानीय मौसम प्रणालियाँ और अन्य वैश्विक कारक भी मानसून को प्रभावित करते हैं। इसलिए एल नीनो को एक "जोखिम बढ़ाने वाला कारक" माना जाना चाहिए, न कि सूखे की गारंटी।
